रक्षासूत्र है शक्ति के संकल्प का प्रतीक
Updated: Aug 26
हर साल श्रावण मास की पूर्णिमा को जब चंद्रमा अपनी पूरी आभा के साथ आकाश में चमकता है, तब भारत के करोड़ों घरों में एक अत्यंत पवित्र और गूढ़ अनुष्ठान जीवंत हो उठता है। थालियों में कुमकुम, अक्षत, रोली और दीप सजते हैं, और हवा में इलायची व चंदन की भीनी-भीनी सुगंध घुल जाती है। घरों में झूले डलने लगते हैं और उन्हीं झूलों के साथ झूलता है प्रेम से भरा एक अटूट संबंध; भाई बहन का संबंध जिसे रक्षाबंधन, राखी, सलूनों, कजरी आदि नामों से जाना जाता है।
ऊपरी तौर पर देखने वाले कई लोग रक्षाबंधन को एक साधारण या पितृसत्तात्मक प्रथा मान लेते हैं जहाँ बहन एक धागा बाँधकर भाई से सुरक्षा की गुहार लगाती है और भाई बदले में रक्षा का वचन देता है। लेकिन यह सतही सोच रक्षाबंधन के उस आध्यात्मिक और दार्शनिक मूल को पूरी तरह से नकार देती है जो सदियों गहरा है। जब हम आधुनिक उपभोक्तावाद और संकीर्ण परिभाषाओं से परे देखते हैं, तो एक महान सत्य उभरता है कि बहन अपने भाई के समक्ष किसी अबला या आश्रित के रूप में नहीं खड़ी होती। वह प्रकृति सृष्टि की आद्याशक्ति और जननी के रूप में उपस्थित होती है, और उसके हाथ में जो रक्षासूत्र है, वह सुरक्षा की भीख नहीं बल्कि भाई को आत्मिक बल, चेतना और धर्म की दिशा देने वाला एक पवित्र आशीर्वाद है।
भारतीय दर्शन में संपूर्ण ब्रह्मांड का संचालन पुरुष (चेतना) और प्रकृति (ऊर्जा व क्रिया) के शाश्वत संतुलन से होता है। प्रकृति निष्क्रिय नहीं है, वह सृजनकर्ता है, पोषण देने वाली है और वही पूरे ब्रह्मांड की रक्षा करती है। जननी के रूप में स्त्री जीवन के बीज को धारण करती है और सृष्टि की निरंतरता को बनाए रखती है। पौराणिक आख्यानों में भी रक्षासूत्र बाँधने की परंपरा केवल भाई-बहन तक सीमित नहीं थी; भविष्य पुराण में जब देवासुर संग्राम में देवता पराजित होने लगे, तब इंद्राणी ने अपने पति देवराज इंद्र की कलाई पर रक्षासूत्र बाँधा था, और महाभारत में जब श्रीकृष्ण की उंगली से रक्त बहने लगा, तब द्रौपदी ने अपनी साड़ी का आंचल फाड़कर उनकी उंगली पर बाँध दिया था। इन गाथाओं में स्त्री कभी असहाय नहीं दिखती, बल्कि वह अपनी संकल्प-शक्ति से पुरुष को संकटों से उबारने वाली और उसे धर्मपथ पर स्थिर रखने वाली संहारक व संरक्षक शक्ति बनती है।
अनुष्ठान के विधान को ध्यान से देखें तो बहन सीधे धागा नहीं बाँधती, बल्कि पहले वह पूजा की थाली तैयार करती है जो स्वयं ब्रह्मांडीय तत्वों का प्रतीक है। आरती उतारने के बाद वह अपनी अंगुली से भाई के आज्ञा चक्र पर कुमकुम का तिलक लगाती है और ऊपर से अक्षत अर्पण करती है। तिलक लगाने का यह कृत्य अत्यंत दार्शनिक और समर्थकारी प्रतीत होता है, जहाँ बहन भाई का राजतिलक करती है और उसे विजयी होना का आशीष प्रदान करती है। वह भाई के भीतर छिपे धर्म और आत्मबल को जगाती है और उसे याद दिलाती है कि उसका बल समाज के निर्बलों की रक्षा और नारी के सम्मान के लिए है। भाई को उस क्षण जो शक्ति मिलती है, वह उसकी अपनी भुजाओं की नहीं, बल्कि बहन के संकल्प और आशीर्वाद से प्राप्त आध्यात्मिक शक्ति होती है।
एक आधुनिक स्त्री-विमर्श और सनातन दृष्टिकोण इस संकीर्ण सोच को तोड़ता है कि केवल पुरुष ही रक्षा करता है। आज जब बहन भाई की कलाई पर धागा बाँधती है, तो वह उसके चरित्र की रक्षा करती है और उसे अहंकार, अन्याय तथा अज्ञान जैसे आंतरिक शत्रुओं से बचाती है। वह भाई को जीवन के मानसिक तनावों और भटकन से अपनी प्रार्थनाओं के माध्यम से सुरक्षित रखती है। बदले में भाई का संकल्प केवल अपनी बहन का अंगरक्षक बनना नहीं है, बल्कि इस बात का वचन देना है कि वह समाज में प्रकृति रूपी स्त्रीशक्ति के हर रूप का सम्मान करेगा और एक ऐसा सुरक्षित वातावरण बनाएगा जहाँ हर स्त्री निर्भय होकर जी सके।
रक्षाबंधन हमें सिखाता है कि मनुष्य एकाकी जीव नहीं है, हम सभी एक-दूसरे से कर्तव्य, प्रेम और नैतिक उत्तरदायित्वों से बँधे हैं। सूत या रेशम का वह छोटा सा धागा भले ही देखने में साधारण लगे, लेकिन उसमें हज़ारों वर्षों की सांस्कृतिक चेतना और प्रेम का स्पंदन होता है। यह पर्व हमें याद दिलाता है कि वास्तविक सामर्थ्य दूसरों पर अधिकार जमाने में नहीं, बल्कि जीवन का पोषण करने और नैतिक मूल्यों को बनाए रखने में है। इस प्रकार बहनें अपनी आंतरिक शक्ति से भाई के विवेक का राज्याभिषेक करती हैं और एक ऐसे समाज की नींव रखती हैं जो धर्म, करुणा और परस्पर सम्मान पर टिका हुआ है। यह रक्षा सूत्र केवल एक धागा न होते हुए अटूट प्रेम को बांधने की प्रक्रिया है जहां दो व्यक्ति अपने वचनों से एक प्रेम संबंध में बंध जाते हैं और एक दूसरे के लिए तत्परता प्रगट करते हैं।
रक्षाबंधन का पर्व प्रकृति की उपासना का पर्व भी है, सावन की पड़ती फुहार और कजरी के गीत संग बाग में पड़े झूले ये बताते हैं कि भारतीय परंपरा कितनी समृद्ध और सुखमय जीवन का प्रतिपादन करने वाली है। ऐसी व्यवस्थाएं होने के बाद भी केवल हमारे अपने एक आँख वाले दृष्टिकोण के चलते हमनें अपनी परंपराओं और त्यौहारों पर प्रश्न उठाने शुरू कर दिया और आज का समाज को मानों भ्रामिकता में ही जी रहा हो। उनके दोहरे मापदंडों के चलते ही वह इन कथाओं, त्यौहारों और पर्वों के महत्व को समझ पाने में असमर्थ प्रतीत होते हैं।
रक्षाबंधन का पर्व भारतीजी परंपरा के उच्चतम आदर्शों का प्रतिपादन करता है, जहां शक्ति रूप में बहन अपने भाइयों को रक्षा सूत्र बांधकर उन्हें दैहिक, दैविक और भौतिक तापों से बचाने का संकल्प लेती हैं और अपने तपोवल से सूर्य को रोकने वाली सावित्रियां अपने प्राणों से प्यारे संबंधियों के लिए रक्षासूत्र के माध्यम से सदा उनके साथ तत्परता से खड़ी रहती हैं और इसे के विपरीत भैया या अन्य व्यक्ति का कर्तव्य बन जाता है कि वह इस परस्पर चलते संबंध को पूर्ण निष्ठा से निभाए और उस बहन की भी हर परिस्थिति में रक्षा करे। रक्षा देना या रक्षा करना अधिकार और स्वतंत्रता छीनना नहीं होता वह एक सामाजिक कर्तव्य है जो सभी को निभाना चाहिए।



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