पाश्चात्य अवबोध, भारतीय पुनर्जागरण और हिन्दू धर्म-परम्परा का पुनर्गठन

उदयन- ऐसी स्थिति में जब हमारे नागर आभिजात्य जन पश्चिमी विज्ञान आदि से प्रभावित थे, इस प्रभाव का असर उनकी धर्म और व्यापक ज्ञान की समझ पर भी पड़ा होगा। ऐसा प्रभाव किसी एक अनुशासन (यहाँ विज्ञान) में बँधकर कैसे रह सकता था।
मुखोपाध्याय - पश्चिम के ज्ञान का और धर्म का भी प्रभाव उन लोगों पर हो रहा था । इनमें से अनेक लोग पश्चिमी संस्कृति और ईसाई मजहब के सम्बन्ध के बारे में सचेत नहीं थे। इसलिए भारत के कई नागर आभिजात्य ईसाईयत के प्रति भी सकारात्मक हो गये। उन्हें यह लगा कि ईसाईयत की बदौलत ही पश्चिम को उच्च कोटि का ज्ञान प्राप्त हुआ है। जिन्होंने अपने को ईसाईयत में ढाल लिया था ऐसे माईकल मधुसूदन दत्त जैसे कुछ लोग हिन्दू धर्म के विरुद्ध प्रचार-प्रसार और उसे निन्दित करने के मिशनरी प्रयासों को किसी हद तक स्वीकार नहीं कर पाये और उन्होंने पहली बार इसके विरुद्ध प्रतिक्रिया की। उस समय बौद्धिकों की प्रतिक्रिया का रूप दो स्तरों पर था। इससे अधिकतर पारम्परिक लोग अप्रभावित बने रहे। वे सोचते थे कि इन्हें यह सब प्रचार-प्रसार करने दो, ये अज्ञानी हैं। उन्होंने इन मिशनरियों को सीधे-सीधे नकार दिया और कोई प्रतिक्रिया देना ठीक नहीं समझा। यह कई बार हुआ। नागर आभिजात्यों ने सोचा कि यह नहीं चल सकता, हमें इसका उत्तर देना ही होगा। उन्होंने हिन्दू धन की ईसाई मिशनरियों द्वारा की गयी आलोचना की प्रतिक्रिया को जाने-अनजाने एक विशेष मोड़ दिया। उन्होंने पश्चिम के हिन्दू धर्म के आलोचकों को पराजित करने के लिए स्वयं हिन्दू धर्म की आलोचना करना शुरू कर दिया। इस तरह उन्होंने पश्चिमी आलोचकों को यह दर्शाया कि इस परम्परा की आलोचना हम तुमसे बेहतर कर सकते हैं। वे यह कह रहे थे कि जो आलोचना तुम कर रहे हो, वह हमें पहले से पता है। उन्होंने इस प्रक्रिया में परायी आलोचना को इस हद तक अन्तःस्थ कर लिया कि वह उनकी भाषा बन गयी। इसी क्रम में उन्होंने धार्मिक सुधार आन्दोलन शुरू किया। तथाकथित भारतीय पुनर्जागरण (हालाँकि मैं उसे पुनर्जागरण नहीं मानता) के चार चरण हैं। इनमें से हमें इसके राजनैतिक आयाम के अलावा बाकी तीनों की बहुत कम जानकारी है जबकि वह सबसे बाद का चरण है। आरम्भिक चरण धार्मिक सुधार आन्दोलन है। इसमें उन्होंने विदेशी आलोचकों को यह कहकर पराजित किया था कि आपकी आलोचना जिस सीमा तक उचित है, वह हिन्दू धर्म के उस भाग पर लागू होती है जो वास्तविक हिन्दू धर्म नहीं है। वहीं एक वास्तविक हिन्दू धर्म है, जिसके विषय में आप जानती ह नहीं हैं और वह हिन्दू परम्परा आपकी धार्मिक परम्परा से बेहतर है। इस प्रक्रिया में उन्होंने अपने धर्म के बारे में स्वयं अपनी दृष्टि को परिवर्तित कर लिया।
उदयन - मुझे आप इस परिवर्तन के वास्तविक स्वरूप के विषय में बताएँ? उससे उनकी समझ में क्या फर्क पड़ा? यह पूछते समय मैं यह कहना चाह रहा हूँ कि महज प्रत्यय बदल देने से दृष्टि में बदलाव नहीं आता। यहाँ जिस तरह की संस्कृति है, उसमें जब तक किसी संघटना की व्याख्या का भीतरी ढाँचा नहीं बदलता, तब तक कुछ विशेष नहीं बदलता।
मुखोपाध्याय - इन बौद्धिकों ने वेद और वैदिक संस्कृति के बीच ऐतिहासिक अन्तराल के कारण अन्तर दिखाया। दूसरे शब्दों में उन्होंने यह कहा कि जिसे हिन्दू परम्परा या धर्म कहा जाता है, वह वस्तुतः दीर्घकालीन विकासमान एक प्रक्रिया है, जिसके विभिन्न चरण हैं। उन्होंने कहा कि इस धर्म परम्परा में तीन मुख्य चरण हैं। आरम्भिक चरण और मध्यकालीन चरण के बीच एक और भी चरण, औपनिषदिक चरण था। उस दूसरे चरण में धर्म के आरम्भिक स्वरूप को नकारा गया था और एक नया उच्चतर धर्म भारत में विकसित हुआ जो सारी दुनिया में अब तक उत्पन्न अन्यान्य धर्मों से कहीं उच्चतर था। तीसरे चरण, मध्य युग में धर्म के पहले चरण का पुनराविष्कार या पुनराख्यान हुआ धार्मिक सुधारवादियों ने हिन्दू धर्म के आलोचकों को यह कहकर प्रश्नांकित किया कि आप लोग जिस धर्म की आलोचना कर रहे हैं, वह मध्यकाल में हिन्दू धर्म के आरम्भिक चरण का पुनर्वास है, जो दरअसल इस धर्म का अपेक्षाकृत दरिद्र रूप है। उन्होंने पश्चिमी आलोचना का प्रतिरोध करते हुए वैदिक संस्कृति और वैदिक साहित्य के बीच अन्तर दिखाया। यह करते हुए उन्होंने वैदिक साहित्य को देखने की पश्चिमी दृष्टि को आत्मसात् कर लिया। यह काफ़ी उलझी हुई पर दिलचस्प घटना है। यह जानना आवश्यक है कि हिन्दू धर्म की पश्चिमी आलोचना को परास्त करने के लिए वे पाश्चात्त्य दृष्टि का ही उपयोग कर रहे थे। भारतीय दृष्टि से समूची वैदिक परम्परा में न कोई अन्तराल है और न आपसी स्वीकार या नकार। उसमें शुरू से आखिर तक एक-वाक्यता है। उसमें निरन्तरता है और द्वन्द्वहीन लय है। मैक्समूलर और उनके जैसे अन्य अध्येताओं ने भाषा-शास्त्रीय और विकासवादी दृष्टियों के मिश्रण से यह पाया कि जिसे वैदिक साहित्य कहा जाता है, उसमें कम-से-कम तीन भिन्न सोपान या कम-से-कम दो स्पष्ट सोपान रहे हैं। पहला आरम्भिक वैदिक साहित्य है जिसे संहिता कहा जाता है। बाद का सोपान उपनिषद् हैं। उपनिषद् भाग संहिता के बाद का है। उनके वैदिक साहित्य (संहिता) को उपनिषदों से अलग मानते ही उन्होंने इन दोनों के बीच विषमता उत्पन्न कर दी। यह विषमता काल की भी थी और कथ्य की भी।
उदयन - क्या आप यह कह रहे हैं, भारतीय बौद्धिकों ने अपनी परम्परा को देखने की पश्चिमी पद्धति अपना ली और इस तरह अपनी ही परम्परा का इस नयी दृष्टि के आधार पर पुनर्विन्यास कर लिया?
मुखोपाध्याय - यह दृष्टि भारतीयों के लिए भले नयी हो, पश्चिम के अध्येताओं के लिए सहज थी क्योंकि उनके चिन्तन में विकासवाद अन्तर्निहित है। इसीलिए वे मानते थे (हैं) कि जो भी पुराना है, वह नये की तुलना में आदिम है, कम विकसित है और बाद की चीज़ या विचार अपेक्षाकृत अधिक विकसित है। इसी कारण ये पश्चिमी अध्येता पश्चिम को यह बताने लगे कि प्राचीन धर्म परम्परा अपेक्षया निम्न कोटि का था। इस विचार को भारत के नागर आभिजात्य बौद्धिकों ने स्वीकार कर लिया। उन्होंने यह कहना शुरू कर दिया कि उपनिषदों में वर्णित भारतीय धर्म ही श्रेष्ठतम था लेकिन मध्ययुग में इस श्रेष्ठ धर्म को तिरस्कृत कर पुरोहितों ने स्वार्थ के लिए आरम्भिक वैदिक धर्म का पुनर्वास किया ताकि वे लोगों का शोषण कर सकें। यह सारा का सारा पाश्चात्त्य अवबोध था। उन्होंने कहा कि वे औपनिषदिक धर्म की पुनःस्थापना में लगे हैं। इस तरह वैदिक धर्म फिर औपनिषदिक फिर वैदिक धर्म की पुनःस्थापना और अन्त में औपनिषदिक धर्म की पुनःस्थापना, ऐसा इतिहास तैयार हो गया। औपनिषदिक धर्म की पुनःस्थापना ही ब्रह्म धर्म है। यही अपने दूसरे रूप में आर्य समाज है। इसी का एक और रूप पार्थ समाज है।
यह संवाद औपनिवेशिक काल में भारतीय नागर आभिजात्य वर्ग की धर्म और अपनी सांस्कृतिक परंपरा के प्रति बदलती वैचारिक दृष्टि का सूक्ष्म विश्लेषण प्रस्तुत करता है। इसमें यह स्पष्ट होता है कि किस प्रकार पश्चिमी आलोचना और ईसाई मिशनरियों का मुकाबला करने के लिए भारतीय बौद्धिकों ने अनजाने में ही पाश्चात्य विकासवादी और ऐतिहासिक दृष्टिकोण को अपना लिया और अपनी प्राचीन वैदिक परंपरा को अलग-अलग चरणों (जैसे औपनिषदिक और मध्यकालीन) में विभाजित कर देखा। इस प्रक्रिया ने न केवल पारंपरिक चिंतन को बदला, बल्कि 'वास्तविक हिन्दू धर्म' की खोज के नाम पर ब्रह्म समाज और आर्य समाज जैसे महत्वपूर्ण धार्मिक सुधार आंदोलनों की आधारशिला रखी।
संदर्भ: "यह बातचीत; भारतीयता की आत्मागवेषणा: आधुनिक भारत की निर्मिति पर न्यायशास्त्री दृष्टि पुस्तक में संकलित है जो भारतीय दार्शनिक अनुसंधान परिषद से प्रकाशित है।"





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